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Chapter 1 - Unnamed

यह कहानी है जंगल में रहने वाले एक ठग की दो बेटियों की जो जंगल से गुजरने वाले मुसाफिरों को छल कपट से लूटकर उनका कत्ल कर देती पर फिर एक दिन एक ऐसा मुसाफिर आया जिससे उन सबकी जिंदगी बदल गई एक गुस्सैल राजा ने अपने पुत्र के किसी दोष के कारण उसे देश निकाला दे दिया राजकुमार ने दुखी मन से अपने गुजारे के लिए चार लाल और कुछ स्वर्ण भी अपने साथ ले लिए और भरे हृदय से अपने पिता का महल छोड़ दिया चलते-चलते वह जब शहर से कुछ दूर पहुंचा तो उसे एक साधु का आश्रम दिखाई किया राजकुमार उस साधु को दंडवत प्रणाम करके एक तरफ बैठ गया जब साधु ने उसकी मायूस शक्ल और देह पर कीमती वस्त्र देखे तो साधु ने उससे पूछा बच्चा तुम कौन हो और यहां कैसे आए राजकुमार बोला महाराज मैं राजा चंद्रगुप्त का पुत्र महेंद्र गुप्त हूं मुझे मेरे पिता ने देश निकाला दे दिया है इसीलिए मैं परदेश जा रहा हूं रास्ते में आपका आश्रम दिखाई दिया तो मेरे मन में आया कि आपके भी दर्शन करता चलूं साधु ने महेंद्र गुप्त की बात सुनकर कहा वत्स तुम नेक इंसान हो और परदेश जा रहे हो इसलिए मैं तुम्हें चार बातें बताता हूं तुम उन बातों पर अमल करना परदेश में यह बातें तुम्हारे अवश्य ही काम आएंगी पहली यह कि परदेश में एक से भले दो होते हैं दूसरी यह कि परदेश में दूसरे के हाथ का बना खाना मत खाना अगर खाना भी पड़े तो पहले किसी जानवर को खिला देना तीसरी बात यह कि परदेश में किसी दूसरे की बिछाई हुई चारपाई पर मत सोना अगर सोना भी हो तो पहले बिस्तर को अच्छी तरह झाड़ लेना चौथी बात यह कि यदि कहीं शत्रुओं के फंदे में फंस जाओ तो जहां तक हो सके नरमी और ज्ञान की बातें सुनाकर अपना उद्देश्य प्राप्त करना साधु ने कहा मेरी यह चार बातें हमेशा याद रखना साधु की बातें सुन साधु को प्रणाम कर राजकुमार परदेश चल पड़ा जब चलते-चलते बहुत दिन बीत गए तो वह एक जंगल में पहुंचा वहां उसने देखा कि एक चील एक कछुए के बच्चे को लेकर उड़ी जा रही है संयोग वर्श बच्चा उस चील के पंजे से निकल कर गिर गया महेंद्र गुप्त ने कछुए के तड़पते हुए बच्चे को देखा तो उसे बड़ी दया आई उसने मन में सोचा कि इस बच्चे को पालना चाहिए इस बच्चे को पालने से दो बातें होंगी पहली तो यह कि इस बच्चे के प्राण बच जाएंगे और दूसरी यह कि साधु द्वारा कही गई पहली बात भी पूरी हो जाएगी कि सफर में एक से भले दो होते हैं और इससे बातें करते हुए दिन भी आसानी से बीतें यह सब सोचकर महेंद्र गुप्त ने बच्चे को अपने साथ ले लिया अब सफर में उसके साथ वह कछुए का बच्चा भी हो लिया कुछ दिन के सफर के बाद राजकुमार को एक अच्छा सा स्थान दिखाई पड़ा उस स्थान पर पहुंचकर उसने कुछ खाया पिया और फिर कछुए के बच्चे से बोला तुम यहां बैठे रहना मैं जरा थोड़ी देर सो लूं यह कहकर महेंद्र गुप्त एक पेड़ के नीचे सो गया उसी पेड़ के ऊपर एक सांप और एक कौवा रहते थे उन दोनों का यह दस्तूर था कि जब कोई मुसाफिर उस पेड़ के नीचे ठहरता तो सांप उसे डस लेता और कौवा उसकी आंखें निकाल लेता नाग ने जब सोते हुए मुसाफिर को देखा तो पेड़ के नीचे उतरा और राजकुमार को डस लिया सांप के डस ही तुरंत राजकुमार के प्राण पखेरू उड़ गए कुछ देर में जब कछुए की नजर महेंद्र गुप्त पर पड़ी तो वह उसे मरा देखकर बहुत घबराया और महेंद्र गुप्त के ऊपर बैठकर रोने लगा तभी कोआ भी पेड़ सेनी नीचे उतरा और ज्यों ही उसने महेंद्र गुप्त की आंखें निकालनी चाही त्यों ही कछुए ने झपट कर कोए की गर्दन को मुंह से पकड़ लिया कोए ने बहुत जोर लगाया मगर कछुए ने उसे नहीं छोड़ा तब कोए ने सांप को पुकारा कौवे की आवाज सुनकर सांप आ गया उसने बड़े जोर से कछुए की पीठ पर डंक मारा परंतु कछुए ने अपना मुंह भीतर कर लिया सांप ने कई बार कछुए की पीठ पर डंक मारा किंतु हर बार कछुआ अपना मुंह अंदर कर लेता जब सांप का कछुए पर बस नहीं चला तो उसने कछुए से प्रार्थना की कि तुम मेरे मित्र को छोड़ छोड़ दो यह सुनकर कछुआ बोला नहीं तूने मेरे मित्र को डसा है अब मैं भी तेरे मित्र की जान लूंगा तू मेरे मित्र को छोड़ दे तो मैं तेरे मित्र को जीवित कर दूंगा यह कहकर सांप ने कांटी हुई जगह पर मुंह रखकर महेंद्र गुप्त के शरीर से विष खींच लिया और बोला अब तो मेरे मित्र को छोड़ दें कछुए ने जब राजकुमार को देखा कि उसे थोड़ा होश आ रहा है और उसका जहर उतर रहा है तो उसने कोय को छोड़ दिया जब महेंद्र गुप्त को होश आया तब कछुए ने उसे सांप के डसने का सारा हाल सुनाया कछुए की बात सुनकर तुरंत महेंद्र गुप्त के मन में सा साध की बताई पहली बात खटकी सोचा साधु की एक बात तो काम आई कि एक से भले दो होते हैं मन ही मन उसने साधु को धन्यवाद दिया और आगे बढ़ चला चलते-चलते कुछ दिनों के बाद जब वे समुद्र के किनारे जा पहुंचे तब कछुए के बच्चे ने कहा मित्र मेरा देश आ गया है यदि तुम कहो तो मैं अपने माता-पिता से मिलाऊं उनसे बिछड़े बहुत दिन हो गए हैं वे बहुत दुखी होंगे महेंद्र गुप्त ने उसे जाने की आज्ञा दे दी और स्वयं रात को वहीं समुद्र के किनारे उस जंगल में ठहर गया जिस जंगल में राजकुमार ठहरा हुआ था उसी जंगल में वहां से कुछ दूर ही एक ठग का परिवार रहता था ठग के दो लड़कियां और चार बेटे थे उसकी बड़ी बेटी ज्योतिष विद्या जानती थी जब भी कोई राहगीर कोई यात्री उस जंगल से गुजरता और उसके पास कुछ कीमती होता तो ठग की बड़ी बेटी अपनी विद्या से जान लेती थी आज फिर से उसे बहुत दिनों बाद बहुत से खजाने की महक आई उसने अपने पिता से कहा ऐसा प्रतीत होता है कि इस जंगल में एक पथिक आया हुआ है उस पथिक के पास चार लाल हैं यदि तुम लोग उस पथिक को यहां ले आओ तो उससे लाल लेना मेरा काम है यदि वे लाल हमको मिल जाएं तो हम जन्म भर के लिए निहाल हो जाएंगे परंतु उस पथिक को मारना मत उसे जीवित ही पकड़ लाओ ठग अपने बेटों के साथ तुरंत उसकी तलाश में निकल पड़ा वे थोड़ी ही दूर चले होंगे कि उन्होंने देखा एक आदमी एक पेड़ के नीचे सो रहा है उसे देखकर उन्होंने सोचा कि यह वही पथिक हो सकता है जिसके पास लाल हैं वे उसे पकड़ कर ले गए और अपनी बड़ी बेटी के हवाले करके बोले इससे लाल निकलवाना अब तेरा काम है ठग की बड़ी बेटी ने पूरे आश्वासन के साथ कहा तुम लोग चिंता मत करो मैं इससे लाल निकलवा लूंगी ठक की छोटी बेटी ने जब महेंद्र गुप्त को देखा तो वह दिलो जान से उस पर मोहित हो गई पहली ही नजर में वह अपना दिल उस नौजवान राजकुमार को दे बैठी भाइयों के डर से कुछ कह तो ना सकी लेकिन मन ही मन उसको बचाने की युक्ति सोचने लगी कुछ देर बाद ठग की बड़ी बेटी ने खाना बनाया और उसमें जहर मिला दिया वही खाना उसने महेंद्र गुप्त को परोस दिया जब थाली महेंद्र गुप्त के सामने आई तो उसने खाने के लिए निवाला तोड़ जैसे ही उसे खाने को हुआ तभी उसे साधु की कही गई दूसरी बात याद आई उसने थाली में से थोड़ा सा भोजन निकालकर कुत्ते के सामने डाल दिया जैसे ही उस खाने को कुत्ते ने खाया वो तुरंत मर गया यह देखकर महेंद्र गुप्त ने भोजन नहीं किया उसने अपने मन में सोचा कि साधु की दूसरी बात भी काम आई अपनी इस चाल को असफल होते देखकर ठग की बड़ी बेटी को गुस्सा तो बहुत आया पर वह अपने गुस्से को अंदर ही अंदर पी गई उसने महेंद्र गुप्त के सोने के लिए पलंग तैयार करवाया और उससे कहा जाओ पथिक ऊपर के कमरे में तुम्हारे लिए पलंग तैयार करवा दिया है अब तुम आराम करो कई दिनों की सफर की यात्रा के कारण थका हुआ राजकुमार जब ऊपर आया तो उसे बढ़िया धुली हुई चादर पलंग पर बिछी हुई दिखाई दी सोचा जो हुआ सो हुआ कई दिनों के बाद चैन की नींद तो सोने को मिलेगी वो जैसे ही पलंग पर बैठने को हुआ तो उसे साधु की तीसरी बात याद आई कि परदेश में हमेशा बिस्तर को झाड़ करर सोना जैसे ही उसने बिस्तर को झाड़ा तो उसके होश उड़ गए वो बिस्तर एक कच्चे सूत से तैयार किया गया था जिसके नीचे आग का कुआं था महेंद्र गुप्त ने देखा कुएं के अंदर बड़े-बड़े आग के अंगार धधक रहे हैं सोचा साधु की तीसरी बात भी काम आई उसने एक बार फिर मन ही मन साधु का धन्यवाद किया और पास पड़ी एक टूटी हुई चारपाई पर लेट गया थोड़ी देर पहले जो राजकुमार चैन की नींद लेने की सोच रहा था अब नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी अब तो उसे अपनी जान के लाले पड़े थे सोचने लगा आज की रात बचना बहुत कठिन है तभी ठग की छोटी बेटी मौका पाकर आई और कहने लगी हे प्रिय मैं तुम पर दिलो जान से न्यौछावर हूं परंतु आज की रात मेरे वश में कुछ नहीं है आज की रात मेरी बड़ी बहन की बारी है जिस तरह भी हो सके बस आज की रात मेरी बहन से अपने प्राण बचा लो कल मेरी बारी है हे स्वामी मैं तुम्हारी दासी हूं मैं तुम्हें साफ बचा लूंगी इतना कहकर ठग की छोटी बेटी चली गई जब सब लोग खाना खा चुके तो ठग की बड़ी बेटी ऊपर बने कमरे में चली सोचा अब तक तो पथिक जलकर राख बन चुका होगा पर जैसे ही वह कमरे के अंदर आई और देखा कि पथिक तो बिल्कुल सही सलामत टूटी हुई चारपाई पर लेटा हुआ है तो उसके क्रोध की कोई सीमा ना रही तुरंत उसने कटार निकाली और क्रोध से बोली हे पथिक या तो अपने चारों लाल मुझे अभी के अभी दे दे वरना मैं तुझको मार डालूंगी उसी समय महेंद्र गुप्त को साधु की चौथी बात याद आई कि कहीं शत्रुओं के फंदे में फ फस जाओ तो जहां तक हो सके नरमी और ज्ञान की बातें सुनाकर अपना उद्देश्य प्राप्त करना उसने सोचा कि आज रात बचना मुश्किल है पर साधू की चौथी बात भी आजमानी चाहिए महेंद्र गुप्त ने यह सब सोचकर लड़की से कहा मेरे पास लाल नहीं है यदि तू मुझको मारेगी तो वैसे ही पछताएगी जैसे बंजारा अपने कुत्ते को मारकर पछताया था लड़की गुस्से में बोली कौन बंजारा और कौन सा कुत्ता क्या बक रहे हो तुम तब राजकुमार बोला तुम नहीं जानती तो सुनो लड़की एक बंजारा था जिसने एक कुत्ता पाल रखा था वो कुत्ता बहुत समझदार था जिसे बंजारा अपनी औलाद से भी ज्यादा प्यार करता था एक समय ऐसा आया कि एक कातक नाम की भयंकर बीमारी के चलते बंजारे का सारा परिवार उस बीमारी की भेंट चढ़ गया और बंजारे की करोड़ों की संपत्ति भी बिक गई दुखी बंजारा अपने कुत्ते को लेकर आगरा में एक साहूकार के पास जाता है और साहूकार को 10000 के बदले अपना कुत्ता गिरवी रखने को बोलता है उस समय 10000 एक बहुत बड़ी रकम होती थी पहले तो बनिए ने बंजारे को मना कर दिया पर फिर कुछ सोचकर उसने बंजारे को ₹1000000 दे दिए कुछ ही समय बीता था कि एक रात सेठ के घर डाकू घुस गए बंजारे का कुत्ता सब हरकत देख रहा था सोचा भोकू तो परिवार के सब लोग उठ जाएंगे और यह डाकू उनका भी कत्ल कर देंगे वो चुपचाप बस उनको देखता रहा जब डाकू सेठ के घर चोरी किए हुए धन को लेकर चल पड़े तो कुत्ता चुपचाप उनके पीछे-पीछे हो लिया सेठ के पास इतना धन था कि डाकू उसे निकाल तो लाए पर अब उनसे वो लेकर चला भी नहीं जा रहा था दिन भी निकलने के करीब हो चला था डाकुओं ने सोच विचार कर उस धन को एक तालाब के अंदर छिपा दिया सोचा बाद में आर आम से निकाल ले जाएंगे कुत्ता डाकुओं की सब करामात देख चुपचाप वापस घर चला गया सुबह हुई तो सेठ के घर कोहराम मच गया पता चला कि चोर सारा धन निकाल ले गए सेठ का रो-रोकर बुरा हाल था आसपास के लोग उसे दिलासा दे रहे थे सेठ ने रोते-रोते कहा मैंने सुना था बंजारे का कुत्ता बहुत समझदार है पर यह नमक हराम तो एक बार भोंका तक नहीं तभी बंजारे का कुत्ता उस सेठ की धोती पकड़कर खींचने लगा कुत्ते की हरकत देख पास खड़े एक समझदार व्यक्ति ने सेठ से कहा सेठ जी यह कुत्ता कुछ कहना चाह है हमें इसकी सुननी चाहिए और सभी लोग कुत्ते के पीछे-पीछे हो लिए सबको लेकर कुत्ता उसी तालाब के पास पहुंच गया जहां रात को डाकुओं ने सारा धन छिपाया था और तालाब में घुसकर अशर्फियां से भरी थैली अपने मुंह में दबाकर बाहर आया तुरंत सेठ के नौकर उस तालाब में कूद गए और चोरी किया हुआ सारा धन बरामद कर लिया सब देख सेठ आंखों में अश्रु लिए कुत्ते से कहता है मुझे माफ कर देना मैंने तुम्हें बहुत बुरा भला कहा सेठ ने वहीं कागज मंगवाया और बंजारे के नाम चिट्ठी लिखी भाई बंजारे तेरे कुत्ते ने मेरे 10000 पूरे कर दिए मैं तेरे कुत्ते को तेरे पास भेज रहा हूं अगर तुझे और भी 10 20 500 हजार की जरूरत हो तो मेरे पास आकर ले जाना इतने समझदार कुत्ते को मेरे पास छोड़ने के लिए तह दिल से तुम्हारा धन्यवाद बनिया चिट्ठी कुत्ते के गले में टांग उसे नम आंखों से विदाई देता है कुत्ता घूमता घूमता जब चार-पांच दिन बाद बंजारे के पास पहुंचता है तो कुत्ते को आता देख बंजारे के तन बदन में आग लग जाती है कहता है मैं तुझे बनिए के पास गिरवी रख कर आया था और तू वहां से भाग आया तूने मेरी बेइज्जती कर करवा दी गुस्से में अंधा हुआ बंजारा तुरंत पिस्तौल निकाल कुत्ते को गोली मार देता है और सिर पकड़कर वहीं बैठ जाता है कुछ देर बाद जब उसकी नजर कुत्ते के गले में टंगी हुई पर्ची पर पड़ी तब बंजारा वो पर्ची निकाल उसे पढता है पर्ची पढ़ते ही बंजारा फट पड़ता है वो दहाड़े मार-मार खून के आंसू रोता है पर अब भला क्या हो सकता था बंजारे की कहानी सुना महेंद्र गुप्त ठग की बेटी से कहता है एक और कहानी सुनो लड़की एक राजा के पास एक बहुत समझदार पढ़ाया हुआ तोता था वह बड़ा चतुर था एक दिन राजा तोते को अपने साथ गंगा स्नान को ले गया और उसको घाट पर बैठाकर स्वयं स्नान करने लगा तभी तोते की नजर अमर फल पर पड़ी जो पास ही नदी में बहता हुआ आगे बढ़ा जा रहा था वह उसको नदी से बाहर निकाल लाया और राजा के आने पर उसको वह अमर फल देता हुआ बोला महाराज यह अमर फल है इसे खा लीजिए राजा ने कहा मैं अकेला अमर फल खाकर क्या करूंगा अपने बाग में लगा दूंगा जब इसमें फल लगेंगे तब सब कुटुंब हों को खिलाकर अमर कर दूंगा गंगा स्नान से लौटकर राजा ने वह फल माली को देकर कहा इस फल को बाग में लगा दो थोड़े ही दिनों में पेड़ फल फूल गया उसमें फल लगने लगे एक दिन एक फल पककर पेड़ से गिरा तो उसे सांप ने सूंघ लिया जिससे वह जहरीला हो गया अनजान माली वह अमर फल लेकर राजा के पास आया राजा फल को देखकर बहुत खुश हुआ और कुछ सोचकर वो फल पहले कुत्ते को खाने को दिया क्योंकि राजा बड़ा नीति वादी और विचार वान था वह जानता था कि बिना सोचे समझे किसी भी वस्तु को खाना ठीक नहीं होता राजा ने जो ही वह फल कुत्ते को खिलाया कुत्ता मर गया यह देखकर राजा ने क्रोधित होकर अपने तोते से कहा बेईमान तोते तू हमें जहर देकर मारना चाहता था यह कहकर राजा ने क्रोध में आकर तोते को मार डाला और माली से कहा इस पेड़ के चारों ओर घेरा डाल दो जिससे कोई इसका फल ना खा सके एक दिन उसी शहर में एक सांस बहू में भीषण लड़ाई हुई बुढ़िया घर से निकलकर कहने लगी आज मैं राजा के बाग में जाकर जहर वाला फल खा लूंगी यह कहकर वह बाग में आई और जैसे ही उसने फल तोड़कर खाया तो वह 16 वर्ष की युवती बन गई जब राजा को यह समाचार मिला तो उसे सारा माजरा समझते देर ना लगी राजा को बड़ा दुख हुआ वह कहने लगा वास्तव में यह अमर फल ही है मैंने व्यर्थ ही इतने समझदार तोते को मार डाला इतनी दास्तान कहते-कहते सवेरा हो गया तब ठग की बेटी ने महेंद्र गुप्त से कहा आज तो तूने मुझे बातों में लगाकर अपनी जान बचा ली परंतु आज रात मेरी छोटी बहन की बारी है वो तुझे हरगिज जीवित ना छोड़ेगी जब ठग की छोटी बेटी को पता चला कि महेंद्र गुप्त जिंदा और बिल्कुल सही सलामत है तो उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा अपनी बहन को दिखाने के लिए ऊपरी मन से बोली तुम निश्चित रहो बहन मैं आज इससे लाल लिए बगैर छोड़ने वाली नहीं हूं दिन बीता और रात हुई तब ठक की छोटी बेटी महेंद्र गुप् के पास गई और बोली भगवान का शुक्र है जो तुमने चालाकी से अपनी जान बचा ली महेंद्र गुप्त बोला तुम सब ऐसा क्यों करते हो तब ठग की छोटी बेटी बोली हमारी तो यही रीति है कि मेरे भाई और बाप मुसाफिरों को पकड़ कर लाते हैं और हम बहनें अपनी चालाकी से उनसे माल हथ कर उन्हें मार डालती हैं फिर वह बोली पर तुम चिंता मत करो अब मेरी बारी है और मैं तो दिलो जान से तुम्हारी दासी हूं तुम्हें जैसा समझ पड़े वैसा ही करो यह सुनकर महेंद्र गुप्त बोला प्रिय तुम भी मुझे देखते ही पसंद आ गई थी दिल करता है कि हर पल तुम्हारे पास ही रहूं तुम अपनी बड़ी बहन की तरह नहीं हो तुम एक नेक दिल औरत हो तुमसे मेरा कुछ भी छिपा हुआ नहीं है उसकी बात सुनकर ठग की बेटी ने कहा तुम कहते हो कि मुझसे कुछ भी छिपा नहीं है तो फिर वे लाल कहां हैं महेंद्र गुप्त ने कहा वो चारों लाल मेरी जांघ में है अगर तुम निकालना चाहो तो निकाल लो राजकुमार की बात सुन ठग की छोटी बेटी बोली प्यारे वो लाल तुम्हें ही मुबारक हो मैं तो तुम्हारी दासी हूं तुम्हारे दर्शनों की प्यासी हूं मुझे तुम्हारे सिवाय और कुछ नहीं चाहिए यह सुन महेंद्र गुप्त बोला जो कुछ तुमने कहा है वह तो सब ठीक है लेकिन यह प्यार और प्रेम की बातें सब धरी रह जाएंगी जब हमारे शरीर में प्राण ही नहीं रहेंगे क्योंकि जब तुम्हारे बाप और भाइयों को इसका पता लगेगा तो हम दोनों की खैर नहीं तब ठक की बेटी बोली तुम चिंता मत करो मेरे पास इसका भी उपाय है आज रात को सबके सोने के बाद हम यहां से भाग चलेंगे और कहीं बहुत दूर रहेंगे जहां कभी मेरे भाई और बाप पहुंच ना सके महेंद्र गुप्त बोला पर यह सब होगा कैसे बोली यहां से निकलने का एक ही उपाय है मेरे पिता के पास दो ठनियावे से एक तो दिन भर में 60 कोस चलती है और दूसरी दिन भर में 100 कोस चलती है तुम उनमें से बड़ी वाली को खोल लाना तब तक मैं हम दोनों के लिए कुछ धन बांध कर रख लूंगी जब आधी रात हुई तब महेंद्र गुप्त ऊंटनी को खोलने चला गया महेंद्र गुप्त ऊंटनी ले तो आया मगर जल्दबाजी के कारण वह बड़ी के स्थान पर छोटी को ले आया ठग की बेटी बहुत सा माल लेकर ऊंटनी पर बैठ गई और दोनों चल दिए ऊंटनी जब चलते-चलते 60 कोस पहुंची तो जंगल में रुककर खड़ी हो गई बीच जंगल में ऊंटनी को खड़ी देखकर महेंद्र गुप्त और ठग की बेटी के होश उड़ गए ठग की बेटी बोली अनर्थ हो गया तुम रात के अंधेरे में बड़ी ऊंटनी की जगह छोटी को ले आए मेरे पिता और भाई आते ही होंगे वो हमें नहीं छोड़ेंगे इधर जब सवेरा हुआ तो ठग ने देखा कि उसकी बेटी और मुसाफिर दोनों गायब हैं उसने सोचा कि निसंदेह वह बदमाश मेरी बेटी को भगा ले गया है तबेले में जाकर देखा तो पाया कि छोटी ऊंटनी गायब है और बड़ी वहीं है सोचा ज्यादा दूर नहीं गए होंगे और ऊंटनी पर सवार होकर उसने उसे तेजी से दौड़ा दिया थोड़ी ही देर में जंगल में उस स्थान पर जा पहुंचा जहां महेंद्र गुप्त और उसकी बेटी ठहरे थे महेंद्र गुप्त ने जब उसको आते देखा तो बहुत घबराया और कहने लगा देखो तो तुम्हारा पिता आ रहा है अब उससे प्राण कैसे बचेंगे लड़की ने कहा घबराओ मत और जो मैं कहती हूं उसे ध्यान से सुनो जाओ जाकर उस पेड़ पर चढ़ जाओ जब मेरा बाप तुम्हें पकड़ने के लिए आएगा और पेड़ पर चढ़ेगा तो मैं चुपके से बड़े वाली ऊंटनी पर चढ़कर उसको तुम्हारी डाल के नीचे खड़ा कर दूंगी तुम कूद कर उस पर बैठ जाना इस प्रकार हम दोनों बचकर साफ निकल जाएंगे यह सुनकर महेंद्र गुप्त तुरंत पेड़ पर चढ़ गया तब तक ठग भी वहां आ पहुंचा पिता को देख उसकी बेटी ने फंड करते हुए कहा पिताजी ये दुष्ट मुझे धोखे से यहां भगा लाया आप इसे छोड़ना नहीं यह सुन गुस्से से तिल मिलाया ठग महेंद्र गुप्त को पेड़ पर चढ़ा देखकर ऊंटनी से उतरा और उसे पकड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ने लगा बाप के ऊंटनी से उतरते ही मौका देख ठग की बेटी ऊंटनी पर चढ़कर उसे महेंद्र गुप्त की डाल के नीचे पेड़ के पास ले आई महेंद्र गुप्त तुरंत कूदकर उस पर बैठ गया महेंद्र गुप्त के बैठते ही ठग की बेटी ने ऊंटनी को दौड़ा दिया ठग हाथ देखता रह गया ठग की बेटी और महेंद्र गुप्त कई दिनों का रास्ता तय कर एक शहर में पहुंचे और दोनों वहीं बस गए वहां महेंद्र गुप्त ठग की बेटी के साथ आराम से दिन गुजारता रहा और जब उसके देश निकाले की अवधि पूरी हो गई तब वह उसको लेकर अपने राज्य चला गया और उसके साथ शादी कर हंसता खेलता जीवन व्यतीत किया निष्कर्ष महेंद्र गुप्त और ठग की बेटी की यह कथा हमें यह सिखाती है कि प्रेम और विश्वास का बंधन सबसे मजबूत होता है जब बुद्धिमत्ता धैर्य और निस्वार्थ प्रेम मिलते हैं तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों ना आए सही निर्णय संयम और परस्पर विश्वास हमें हर संकट से बाहर निकाल सकते हैं

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