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Chapter 1 - pahla pyaar 2

हर तरफ हरे-भरे खेत, बीच में एक सरकारी स्कूल और उसके सामने बड़ा-सा बरगद का पेड़। उसी गांव में रहता था **आरव**, पंद्रह साल का एक साधारण लड़का। पढ़ाई में ठीक-ठाक, क्रिकेट खेलने का शौकीन और दोस्तों के साथ मस्ती करना उसकी सबसे बड़ी खुशी थी।

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आरव की जिंदगी बिल्कुल सामान्य थी—सुबह स्कूल, दोपहर को घर, शाम को मैदान और रात को किताबों के साथ थोड़ी-बहुत जंग। लेकिन उसे नहीं पता था कि एक दिन उसकी जिंदगी में ऐसा एहसास आने वाला है जो सब कुछ थोड़ा-सा बदल देगा।

वह दिन जुलाई का था। बारिश का मौसम शुरू हो चुका था। स्कूल के मैदान में हल्की-हल्की मिट्टी की खुशबू फैल रही थी। उस दिन स्कूल में नई लड़की का एडमिशन हुआ।

उसका नाम था **सिया**।

जब सिया पहली बार क्लास में आई, तो पूरी क्लास कुछ पल के लिए शांत हो गई। उसके लंबे बाल थे, बड़ी-बड़ी आंखें और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान। क्लास टीचर ने उसे आरव की बेंच के सामने वाली सीट पर बैठा दिया।

आरव ने पहले तो ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब उसने नोटबुक खोलते समय धीरे से "पेन मिलेगा?" पूछा, तो आरव थोड़ा घबरा गया।

"हां… हां, लो," उसने अपना पेन बढ़ाते हुए कहा।

सिया मुस्कुराई।

"थैंक यू।"

बस वही छोटी-सी मुस्कान आरव के दिल में कहीं गहराई तक उतर गई।

अगले कुछ दिनों में आरव को महसूस होने लगा कि वह अक्सर सिया की तरफ देखने लगा है। जब भी सिया हंसती, उसे अजीब-सी खुशी महसूस होती। जब सिया स्कूल नहीं आती, तो क्लास खाली-सी लगती।

एक दिन लंच ब्रेक में सिया अकेली बैठी थी। शायद अभी उसकी ज्यादा दोस्ती नहीं हुई थी। आरव के दोस्त क्रिकेट खेलने जा रहे थे, लेकिन पता नहीं क्यों उस दिन वह उनके साथ नहीं गया।

वह धीरे-धीरे सिया के पास गया।

"तुम… मैदान में नहीं चलोगी?" उसने हिम्मत करके पूछा।

सिया ने सिर हिलाया।

"मुझे क्रिकेट खेलना नहीं आता।"

आरव मुस्कुराया।

"मैं सिखा दूंगा।"

उस दिन पहली बार दोनों मैदान में साथ गए। आरव ने उसे बैट पकड़ना सिखाया। पहली गेंद पर ही सिया आउट हो गई और दोनों हंस पड़े।

धीरे-धीरे उनकी दोस्ती बढ़ने लगी।

अब रोज स्कूल में एक नया इंतजार होने लगा। क्लास में साथ पढ़ना, लंच में बातें करना, और छुट्टी के बाद थोड़ा-सा रास्ता साथ चलना—ये सब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया।

आरव को समझ नहीं आ रहा था कि उसके अंदर क्या बदल रहा है। जब सिया पास होती, तो दिल थोड़ा तेज धड़कने लगता। जब वह मुस्कुराती, तो लगता जैसे पूरा दिन अच्छा हो गया।

एक शाम, जब स्कूल की छुट्टी के बाद दोनों घर की तरफ जा रहे थे, बारिश शुरू हो गई। दोनों बरगद के पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

बारिश की बूंदें जमीन पर गिरकर मिट्टी की खुशबू फैला रही थीं।

सिया ने आसमान की तरफ देखा और बोली,

"मुझे बारिश बहुत पसंद है।"

आरव ने धीरे से कहा,

"मुझे भी… आज से।"

सिया हंस पड़ी।

कुछ पल दोनों चुप रहे। फिर सिया बोली,

"आरव, तुम बहुत अच्छे दोस्त हो।"

यह सुनकर आरव के दिल में अजीब-सी खुशी और हल्की-सी घबराहट दोनों महसूस हुई।

दिन बीतते गए।

अब आरव को एहसास होने लगा था कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं है। लेकिन वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे क्या नाम दे।

एक दिन उसके दोस्त रोहन ने पूछा,

"तू आजकल इतना मुस्कुराता क्यों रहता है?"

आरव ने हंसकर टाल दिया, लेकिन शायद रोहन समझ गया था।

"लगता है किसी से प्यार हो गया है," रोहन ने चिढ़ाते हुए कहा।

आरव चुप हो गया।

उस रात वह देर तक छत पर बैठा रहा। उसने पहली बार सोचा—क्या सच में उसे सिया से प्यार हो गया है?

लेकिन वह सिर्फ पंद्रह साल का था। उसे डर भी लग रहा था। अगर उसने कुछ कह दिया और सिया नाराज हो गई तो?

अगले दिन स्कूल में सिया थोड़ी उदास लग रही थी।

"क्या हुआ?" आरव ने पूछा।

सिया ने धीरे से कहा,

"पापा का ट्रांसफर हो गया है… शायद अगले महीने हमें इस गांव से जाना पड़े।"

यह सुनकर आरव के दिल में जैसे किसी ने पत्थर रख दिया हो।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे।

पूरा दिन वह चुप-चुप रहा।

उसके बाद का एक महीना बहुत जल्दी गुजर गया। दोनों पहले से ज्यादा समय साथ बिताने लगे—क्लास में, लाइब्रेरी में, मैदान में।

लेकिन दोनों के बीच एक अनकही बात थी, जिसे कोई बोल नहीं पा रहा था।

आखिर वह दिन आ गया जब सिया का स्कूल में आखिरी दिन था।

छुट्टी के बाद दोनों वही बरगद के पेड़ के नीचे खड़े थे।

सिया बोली,

"मैं तुम्हें बहुत मिस करूंगी।"

आरव का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसे लगा अगर आज नहीं कहा, तो शायद कभी नहीं कह पाएगा।

उसने हिम्मत करके कहा,

"सिया… मुझे लगता है… मुझे तुम पसंद हो… शायद बहुत ज्यादा।"

कुछ पल के लिए सब शांत हो गया।

सिया ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में हल्की-सी नमी थी।

"मुझे पता था," उसने मुस्कुराकर कहा।

आरव हैरान रह गया।

"सच?" उसने पूछा।

सिया ने सिर हिलाया।

"मुझे भी तुम बहुत अच्छे लगते हो… लेकिन हम अभी बहुत छोटे हैं। शायद जिंदगी हमें अलग रास्तों पर ले जाए।"

आरव ने पहली बार समझा कि कभी-कभी प्यार का मतलब साथ होना नहीं, बल्कि किसी को दिल से चाहना भी होता है।

सिया ने जाते-जाते कहा,

"जब भी बारिश होगी, तुम्हें मेरी याद आएगी।"

अगले दिन सिया चली गई।

स्कूल वही था, मैदान वही था, बरगद का पेड़ भी वही था… लेकिन कुछ खाली-सा लगने लगा था।

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।

आरव ने पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू किया। लेकिन जब भी बारिश होती, उसे बरगद के पेड़ के नीचे बिताया हुआ वह दिन याद आ जाता।

पहला प्यार शायद जिंदगी भर साथ नहीं रहता, लेकिन उसकी यादें हमेशा दिल के एक कोने में बस जाती हैं।

और आरव के दिल में भी सिया की मुस्कान हमेशा के लिए बस गई थी।

क्योंकि पंद्रह साल की उम्र का पहला प्यार…

भूलना बहुत मुश्किल होता है।

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